काफ़ी दिनों बाद आज हम वापस आये हैं इस ब्लॉग की धरती पर। जो मज़ा कम्प्यूटर या लैप्टॉप पर अलग से जुड़ा हुआ की बोर्ड में धाक जमाकर लिखने में है वो इस फ़ोन में कहाँ ये तो बस छोटे मोटे काम के लिए ही बना है चाहे लाखों का छोटू मशीन लेलो। ठंड काफ़ी बढ़ चुकी है सर्दी भी हो गयी थी दूठो cetrizine नामक गोली खाया तो ठीक है पर असली स्वाद अभी भी ग़ायब है, अभी सिर्फ़ ज़्यादा नमक,ज़्यादा मिर्च और चीनी का ही समझ आ रहा है। कथित लोगों द्वारा शरीर में पैदा करने वाले तरल पदार्थ तो हमसे बहुत दूर चले गये हैं। फ़ोन में तो ज़्यादा टाइप नहीं कर पाऊँगा जब हाथ में कम्प्यूटर आएगा या फिर कोई हिंदी में एक्स्पर्ट मिले तो उससे बहुत सारे ब्लॉग बताकर टाइप करवाने की इच्छा है। राम-राम जय हिंद।
मैं आज पेश करता हूँ ख़ुद की थोड़ी अनसूझी दिमाग़ी हालात की कड़ी- लगता है की मैं वापस चला जाऊँ उस पुराने फ़्लैट पे जहाँ किसी से बातचीत ना हो,तीन टाइम का खाना समय पर आ जाये। शाम होते ही पुरानी गाड़ी से चले जो कभी रोड पे चली हाई नहीं जिससे पुराने गानों की आवाज़ कानों में मधुर छा रही है। कुछ अगर मैं छेड़ दूँ राग अपने लिये शाम में तो कुछ चुनिंदे दोस्त बुला लूँ तसल्ली के लिये कि अभी मैं ज़िंदा हूँ। मैं कभी ख़ुद में अपमानित महसूस करता हूँ शायद मैं जो पाया उससे ज़्यादा चाहता हूँ, करना चाहता हूँ x हो जाता है y इस तरह मैं सबकुछ छोड़कर शायद हालात या मैं या माता-पिता चाहते सो मैं डॉक्टर बनने चला आया।
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