काफ़ी दिनों बाद आज हम वापस आये हैं इस ब्लॉग की धरती पर। जो मज़ा कम्प्यूटर या लैप्टॉप पर अलग से जुड़ा हुआ की बोर्ड में धाक जमाकर लिखने में है वो इस फ़ोन में कहाँ ये तो बस छोटे मोटे काम के लिए ही बना है चाहे लाखों का छोटू मशीन लेलो। ठंड काफ़ी बढ़ चुकी है सर्दी भी हो गयी थी दूठो cetrizine नामक गोली खाया तो ठीक है पर असली स्वाद अभी भी ग़ायब है, अभी सिर्फ़ ज़्यादा नमक,ज़्यादा मिर्च और चीनी का ही समझ आ रहा है। कथित लोगों द्वारा शरीर में पैदा करने वाले तरल पदार्थ तो हमसे बहुत दूर चले गये हैं। फ़ोन में तो ज़्यादा टाइप नहीं कर पाऊँगा जब हाथ में कम्प्यूटर आएगा या फिर कोई हिंदी में एक्स्पर्ट मिले तो उससे बहुत सारे ब्लॉग बताकर टाइप करवाने की इच्छा है। राम-राम जय हिंद।
नमस्कार बहुत दिनों के बाद आज आप सब को बताते हैं कॉफी से संबंधित छोटी सी दास्तां- वैसे तो काफी लोगों के लिए महज गर्म दूध थोड़े कॉफी और चुटकी भर चीनी का मिश्रण हो पर कॉफी के बहाने जुड़े हुए हैं हमारे समाज में। बड़े-बड़े शहरों में छोटे शहरों नगरों में युवक- युवतियां इसी के माध्यम से मिलने का प्रोग्राम बनाते हैं जाहिर है इससे वहां की कुछ दुकानें हैं जो सिर्फ कॉफी का इंटीरियर बनाकर मुनाफा कमाती है। कुछ लोगों के जीवन में दिनचर्या की शुरुआत का हिस्सा बन गया है। हमें तो लोगों को देखकर ही कॉफी पीने का थोड़ा सीखे हैं शौक तो नहीं बोल सकते बचपन से तो चाय पी रहे हैं, बिना दूध वाला कभी अगर मौका मिला तो बाहर में मिलता था होटल में या किसी के यहां मेहमान चले गए तो आधा गिलास भर दिया स्टील गिलास में दूध वाला जैसे कि चाय हमने कभी देखा ही नहीं है। यही होता है अक्सर गांव में। कुछ बच्चे तो छोटे बच्चे अक्सर गांव में सुबह सुबह इसी वजह से मार खाते हैं कि चाय चाहिए चाहिए चाहिए इधर बच्चा भी ढीठ उधर उसकी मां भी ढीठ। इस बदलते दौर के दरमियां चाय कुछ पीछे छूट सी गई है।
व्यस्त रहित समय रहते भी समय रहता नहीं ऐसे माहौल में कही निकल जाना बड़ी बात हो जाती है। ठंडी ठंडी हवा 12 डिग्री टेम्परेचर और गर्मी का एहसास। स्थान- यूक्रेन (खारकीव) यूरोप
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